आजम खान-शिवपाल गठबंधन का डर है! रामपुर क्यों पहुंचे अखिलेश यादव? सामने आ गई बड़ी वजह

Sanchar Now
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नई दिल्ली: समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव बुधवार को आजम खान से मिलने रामपुर पहुंचे. दोनों नेताओं की यह मुलाकात करीब दो साल बाद हो रही है. आजम खान बीते महीने ही सीतापुर जेल से रिहा हुए हैं. आजम खान करीब 23 महीने तक जेल में रहे. उनकी रिहाई से पहले ही इस बात की खबरें आईं कि वो बसपा में शामिल होने जा रहे हैं. कयास लगाए जा रहे थे कि वो 9 अक्तूबर को बसपा की लखनऊ में होने वाली रैली में शामिल हो सकते हैं. इस तरह की अटकलों को हालांकि आजम खान ने तवज्जो नहीं दी. इन परिस्थितियों में आजम और अखिलेश की यह मुलाकात बहुत महत्वपूर्ण और कई अर्थ संजोए हुए है.

आजम खान से मिलकर क्या बोले अखिलेश यादव

आजम खान से मिलने के बाद अखिलेश ने कहा, ” मैं मिलने आया हूं, जेल में मिलने नहीं जा पाया था. आज बैठकर स्वास्थ्य को लेकर उनका हालचाल ले रहा हूं. आदरणीय आजम खान साहब बहुत पुरान नेता हैं. पुराने लोगों की बात ही कुछ और होती है. ये हमारी पार्टी के दरख्त हैं. उनकी जितनी गहरी जड़े हैं, उतनी ही छाया हमें उनसे मिलती है. इनका साथ हमेशा रहा है. यह एक बड़ी लड़ाई है, इसे हम सब लोग मिलकर लड़ेंगे. उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे, उन्हें न्याय मिले. यह शायद देश के इतिहास में और राजनीति के इतिहास में बीजेपी पता नहीं कौन सा वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना चाहती है कि आजम खान साहब के परिवार पर सबसे ज्यादा केस लगे हुए हैं.”

आजम खान के जेल में रहते हुए ही इस बात की खबरें आने लगीं कि वो सपा नेतृत्व से नाराज हैं. उनके समर्थकों का कहना था कि सपा नेतृत्व आजम खान के मामले को उस तरह से नहीं उठा रहा है, जैसे उठाना चाहिए. नाराजगी की इन खबरों के बीच विपक्ष के कई नेताओं ने जेल जाकर आजम खान से मुलाकात की थी. लेकिन उनसे मिलने अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी का कोई कद्दावर नेता नहीं पहुंचा. इसके बाद से ही आजम खाम के सपा छोड़ने की अटकलें लगाई जाने लगीं. आजम खान की रिहाई के बाद ये अटकले और तेजी से फैलने लगीं. लेकिन आजम खान ने उन्हें बहुत अधिक तव्वज्जो नहीं दी. उन्होंने इशारों-इशारों में ही बता दिया कि वो सपा नहीं छोड़ रहे हैं.

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किन बातों से नाराज थे आजम खान

आजम खान की नाराजगी लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर भी है. दरअसल आजम खान नहीं चाहते थे कि  मोहिबुल्लाह नदवी उनके रामपुर से चुनाव लड़ें. लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें टिकट भी दिया और वो जीते भी. इसलिए जब सपा प्रमुख के मिलने आने का कार्यक्रम सार्वजनिक हुआ तो आजम खान ने कहा कि वो सिर्फ अखिलेश से मिलेंगे किसी और से नहीं. उन्होंने वो कहा कि वो रामपुर के सांसद से वाकिफ नहीं हैं और उनसे उनकी कभी मुलाकात भी नहीं है. यही वजह है कि अखिलेश यादव जब आजम खान से मिलने के लिए निकले तो वो मोहिबुल्लाह नदवी को बरेली में ही छोड़ आए. आजम खान मुरादाबाद के पूर्व सांसद डॉक्टर एसटी हसन से भी नाराज बताए जा रहे हैं, उनको लेकर उन्होंने कोई बयान तो नहीं दिया. लेकिन डॉक्टर हसन के बयान से ऐसा ही लगा.

दरअसल समाजवादी पार्टी की राजनीति में मुसलमानों की अहमियत बहुत अधिक है. सपा ने बहुत दिनों तक मुसलमान-यादव के वोट बैंक के आधार पर राजनीति की. लेकिन बीजेपी ने 2014 में गैर यादव ओबीसी, दलितों और अपने मुख्य वोट बैंक अगड़ी जातियों की बदलौत यूपी में सपा और बसपा को जमीन पर ला दिया. उसका यह समीकरण इतना ताकतवर था कि सपा-बसपा 2019 में मिलकर भी बीजेपी को नहीं हरा सके. हालांकि बसपा को इस गठबंधन से फायदा हुआ. लेकिन सपा वहीं की वहीं रह गई. यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा पूरी तरह से साफ हो गई. कमजोर बसपा में अखिलेश यादव को एक उम्मीद नजर आई. इसके बाद उन्होंने पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) नाम का एक नया चुनावी फार्मूला तैयार किया. दरअसल उन्हें लगा कि कमजोर होती बसपा के वोट बैंक को इस फार्मूले से अपनी ओर किया जा सकता है. उन्होंने पीडीए की राह पर आगे बढ़ने का फैसला किया. इसका फायदा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला. इस चुनाव में सपा यूपी में 37 सीटें जीतने में कामयाब रही. यह अब तक के इतिहास में सपा की सबसे बड़ी जीत थी. इस जीत का परिणाम यह हुआ कि बीजेपी स्पष्ट बहुमत पाने से चूक गई. उसे जदयू और टीडीपी के सहयोग से एनडीए गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी.

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क्या हैं अखिलेश यादव की उम्मीदें

लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद अखिलेश यादव की उम्मीदें सातवें आसमान पर हैं. वो 2027 के चुनाव में अपनी सरकार बनाना चाहते हैं. इसके लिए जरूरी है कि उनका PDA उनके साथ बना रहे. इस पीडीए को और मजबूती देने के लिए ही अखिलेश यादव आजम खान से मिलने उनके घर पहुंचे. इस समय उत्तर प्रदेश में आजम खान से अधिक अनुभवी और धाकड़ कोई मुस्लिम नेता नहीं है. मिशन 2027 के लिए आजम खान का सक्रिय होना बहुत जरूरी है. उत्तर प्रदेश और बिहार में मुसलमान वोटों पर एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी की भी नजर है. वो पिछले कुछ चुनावों से यूपी में चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही है. लेकिन उनका वोट बढ़ रहा है. इसे देखते हुए अखिलेश यादव अपने वोट बैंक में बिखराव का कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते हैं.

सपा के लिए अपनी अहमियत को आजम खान अच्छी तरह से जानते हैं. इसके साथ ही वो सपा में कोई और मुस्लिम नेतृत्व भी नहीं खड़ा होने देना चाहते हैं. इसलिए वो दूसरे मुस्लिम नेताओं को बहुत भाव नहीं देते हैं. इसी रणनीति के तहत उन्होंने विपक्षी इंडिया गठबंधन में मुसलमान नेताओं की कमी को मुद्दा उठाया. अखिलेश यादव भी आजम खान की अहमियत जानते हैं इसलिए वो जब उनसे मिलने पहुंचे तो रामपुर के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी उनके साथ नहीं थे. ऐसे समय जब यूपी का विधानसभा चुनाव एक साल से थोड़ा अधिक दूर हों तो अखिलेश यादव आजम खान को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकते हैं. क्योंकि सपा के पीडीए वोट बैंक का ‘ए’ उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

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