पद्म पुरस्कार 2026; यूपी को एक पद्म विभूषण और 10 पद्मश्री सम्मान, जानें योगदान

Sanchar Now
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केंद्र सरकार ने रविवार को यूपी की 10 विभूतियों को गणतंत्र दिवस पर सम्मान देने के लिए चुना है। इन्हें पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा की गई है। जबकि एक को पद्मभूषण दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 के लिए 131 पद्म पुरस्कारों की घोषणा की, जिसमें पांच पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं, जिसमें यूपी से 10 लोगों के नाम शामिल किए गए हैं। इन्हें कला, विज्ञान, इंजीनियरिंग, पुरातत्व, चिकित्सा, कृषि, खेल में योगदान देने के लिए सम्मानित किया जाएगा। इस मौके सीएम योगी ने भी पद्मभूषण और पद्मश्री विजेताओं को बधाई दी। अनिल कुमार रस्तोगी, चिरंजी लाल यादव को कला, अशोक कुमार सिंह को विज्ञान और इंजीनियरिंग, बुद्ध रश्मि मणि को पुरातत्व, केवल कृष्ण ठकराल, राजेंद्र प्रसाद और श्याम सुंदर को चिकित्सा, मंगला कपूर को साहित्य और शिक्षा, प्रवीण कुमार को खेल, रघुपात सिंह मरणोपरांत को कृषि में उत्कृष्ण कार्य करने पर पद्मश्री से नवाजा जाएगा। एन. राजम जी को कला के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार दिया जाएगा।

पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. राजेंद्र प्रसाद और आयुर्वेद सर्जन डॉ. केके ठकराल को पद्मश्री

लखनऊ के दो नामचीन डॉक्टरों को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। रविवार को इनके नाम की घोषणा की गई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केजीएमयू रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और डॉ. केके ठकराल टुड़ियागंज स्थित राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य व पूर्व निदेशक आयुर्वेद हैं। दोनों को उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए देश का चौथा सर्वोच्च सम्मान दिया जाएगा। रेस्परेटरी मेडिसिन क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए प्रसिद्ध पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 17 फरवरी 1950 को बस्ती जिले के मुंडेवा में हुआ था। वह केजीएमयू में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। दिल्ली स्थित पटेल चेस्ट के निदेशक पद भी कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में एरा मेडिकल कॉलेज लखनऊ में प्रोफेसर और मेडिकल शिक्षा के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। वर्ष 1974 में केजीएमयू से एमबीबीएस किया। वर्ष 1979 में टीबी एंड चेस्ट में एमडी की उपाधि हासिल की। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि 400 से अधिक राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। 16 हजार से अधिक लोगों ने शोध पत्र पढ़े। पांच लाख से अधिक मरीजों को इलाज मुहैया करा चुके हैं। 12 चिकित्सा पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें डॉ. बीसी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार सहित 60 से अधिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

आयुर्वेद शल्य विशेषज्ञ हैं डॉ. केके ठकराल

आयुर्वेद में शल्य-शलाक्या सर्जरी की विशेषज्ञता हासिल करने, क्षार सूत्र शल्य चिकित्सा में विशेष योगदान के लिए राजाजीपुरम के डॉ. केके ठकराल को पद्मश्री प्रदान करने की घोषणा हुई है। वह वर्तमान में राजाजीपुरम में निजी क्लीनिक संचालित करते हैं। डॉ. ठकराल का जन्म 10 अक्तूबर 1938 को पाकिस्तान में हुआ था। आयुर्वेद के क्षेत्र में सर्जरी करने में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए उन्हें जाना जाता है। उन्होंने टूड़ियागंज के राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल से बीएएमएस किया। बीएचयू से आयुर्वेदिक सर्जरी से पीजी किया। वर्ष 1996 में आयुर्वेद सेवाएं उप्र के निदेशक पद से रिटायर हुए। उनके कुल 66 रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 12 विदेशों में प्रकाशित हुए। डॉ. ठकराल को वर्ष 1991 में आयुर्वेद रत्नाकर अवार्ड, वर्ष 1992 में आयुर्वेद बृहस्पति अवार्ड, वर्ष 2010 में नागालैंड की ग्लोबल ओपन यूनिवर्सिटी से राष्ट्रीय हर्बल संरक्षण पुरस्कार, वाराणसी बीएचयू के चिकित्सा संस्थान विज्ञान आयुर्वेद संकाय का शल्य विज्ञान रत्न 2015, वर्ष 2016 में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा जा चुका है।

वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने कला के क्षेत्र में दिया योगदान

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लखनऊ के वरिष्ठ रंगकर्मी और अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी को पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। कला के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए रविवार को यह घोषणा की गई। डॉ. रस्तोगी के रंगमंच, टेलीविजन और फिल्म कॅरियर की छह दशकों से अधिक की यात्रा इस सम्मान की पात्रता को सिद्ध करती है। डॉ. अनिल रस्तोगी का जन्म चार अप्रैल 1943 को लखनऊ में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। कॅरियर की शुरुआत में वे सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) लखनऊ में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत रहे, जहां उन्होंने बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रमुख के पद तक का सफर तय किया। वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के बावजूद उनका झुकाव रंगमंच की ओर रहा। 1960 के दशक से उन्होंने रंगकर्म में कदम रखा और आज तक 100 से अधिक नाटकों में अभिनय कर चुके हैं। हाल ही में उन्होंने अपने 100वें नाटक का मंचन किया। इस उपलब्धि को डॉ. अनिल रस्तोगी ने अपने सीडीआरआई के सार्थियों और रंगमंच कलाकारों को समर्पित किया।

बासमती की प्रजातियों पर उत्कृष्ट शोध के लिए डॉ. अशोक को मिला पद्मश्री

मनिहारी के बरहट गांव निवासी डॉ. अशोक कुमार सिंह को पदमश्री मिलने की जानकारी मिलते ही घर, गांव और पूरे जिले में खुशी की लहर है। वह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरई) पूसा के पूर्व निदेशक रहे हैं। पद्मश्री पुरस्कार उन्हें बासमती धान की विभिन्न प्रजातियों पर किए गए उनके उत्कृष्ट शोध के लिए प्रदान किया गया है। गाजीपुर के बरहट निवासी डॉ. अशोक कुमार सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा महावीर इंटर कॉलेज मलिकपुरा से ग्रहण की। उन्होंने यूपी बोर्ड परीक्षा में प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया था। इसके बाद बीएचयू से बीएससी और एमएससी कृषि विज्ञान से पढ़ाई की। डॉ. अशोक कुमार ने पूसा से एचडी की डिग्री प्राप्त की। वह बासमती चावल के प्रजनन में अपने योगदान के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। बासमती धान की कई प्रजातियों पर उन्होंने महत्वपूर्ण शोध किया है। इसमें पूसा बासमती 1637 जैसी उच्च गुणवत्ता वाली किस्में शामिल हैं, जो आयरन और जिंक जैसे पोषकतत्वों से भरपूर हैं। डॉ. सिंह को उनके योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले हैं। इनमें वर्ष 2012 में मिला बोरलॉग पुरस्कार भी शामिल है। वह 2020 से 2024 तक आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक और कुलपति रहे हैं। उनके शोध कार्यों ने न केवल बासमती धान की गुणवत्ता में सुधार किया, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि भी हुई। डॉ. अशोक भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष भानुप्रताप सिंह के चचेरे भाई हैं।

नक्कासी के लिए चिरंजीलाल और रघुपत सिंह को खेती के लिए मिलेगा पद्मश्री

मेटल के उत्पादों पर नायाब नक्काशी गढ़ने वाले दस्तकार चिरंजी लाल और खेती में नए प्रयोग करने वाले किसान रघुपत सिंह को पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। इससे पहले दस्तकारी में शिल्प गुरु दिलशाद हुसैन और बाबूराम को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। मुरादाबाद में अब चार पद्मश्री हो जाएंगे। यह लगातार तीसरा साल है जब मुरादाबाद के शिल्पकार को पद्मश्री अवार्ड देने के लिए चुना गया है। इससे पूर्व शिल्पगुरु के खिताब से अलंकृत मुरादाबाद के शिल्पकार दिलशाद हुसैन को वर्ष 2024 में, यहां के शिल्पकार बाबूराम यादव को 2025 में पद्मश्री पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया था। इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर मुरादाबाद के शिल्पकार चिरंजीलाल यादव को पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा की गई है। चिरंजीलाल यादव 56 साल से मेटल के उत्पादों पर नायाब नक्काशी का हुनर गढ़ रहे हैं। वहीं इसी जिले के बिलारी तहसील के समाथल गांव निवासी किसान रघुपत सिंह को सब्ज़ियों और पौध विविधता के संरक्षण एवं कृषि नवाचार के क्षेत्र में किसान रघुपत सिंह को पद्मश्री मिलेगा। रघुपत सिंह का गुजरे साल निधन हो चुका है उन्हें मरणोपरांत यह पुरस्कार मिलने जा रहा है। वह मुरादाबाद के कृषि पंडित के नाम से विख्यात रह चुके हैं। दो पद्मश्री और मुरादाबाद के खाते में आने से जिले में खुशी का माहौल है। वहीं चिरंजीलाल ने कक्षा सात की उम्र की पढ़ाई करने के बाद पीतल के उत्पादों पर नक्काशी गढ़ना शुरू कर दिया था। भारत सरकार के अधीन 1970 से 1973 तक इस अनूठी कारीगरी का प्रशिक्षण हासिल किया।

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डॉ. बुद्धिरश्मि ने अयोध्या में खुदाई का नेतृत्व किया, पल्मोनरी मेडिसिन के जनक हैं डॉ. राजेन्द्र

बस्ती मंडल की दो विभूतियों को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए पद्मश्री सम्मान के लिए नामित किया गया है। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल पर खुदाई करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले मूल रूप से संतकबीरनगर निवासी डॉ. बुद्धरश्मि मणि त्रिपाठी को पुरातत्व क्षेत्र में सम्मान मिला है। वहीं पल्मोनरी मेडिसिन के जनक के रूप में विख्यात बस्ती के मूल निवासी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को चिकित्सा क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान की घोषणा की गई है। डॉ. बुद्धरश्मि मणि त्रिपाठी मूल रूप से संतकबीरनगर जिले के बेलहर ब्लॉक के कोटिया गांव के रहने वाले हैं। बाद में परिवार बस्ती शहर में बस गया। इनके पिता चंदबलि त्रिपाठी मालवीय रोड स्थित एक मकान में रहकर वकालत करते थे। डॉ. बुद्धिरश्मि ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पुरातत्व विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक और राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली के महानिदेशक रह चुके डॉ. बुद्धिरश्मि ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद स्थल पर खुदाई का नेतृत्व करते हुए रिपोर्ट तैयार की थी। उसके आधार पर कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए थे। संतकबीरनगर में उनका घर अब भी है लेकिन अब वह दिल्ली में रहते हैं। उनके रिश्तेदार बस्ती के गांधीनगर में निवास करते हैं। उन्होंने डॉ. त्रिपाठी को पद्मश्री मिलने पर खुशी जताई है।

प्रसिद्ध पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 17 फरवरी, 1950 को बस्ती जिले के मुंडेरवा क्षेत्र के बरडांड गांव हुआ था। उन्होंने 1974 में केजीएमसी से एमबीबीएस और 1979 एमडी की। बाद में केजीएमसी, लखनऊ में निदेशक चिकित्सा शिक्षा और प्रोफेसर, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग बने। एरा लखनऊ मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज में भी डायरेक्टर रहे। वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट दिल्ली तथा पल्मोनरी मेडिसिन विभाग केजी मेडिकल यूनिवर्सिटी में निदेशक रह चुके हैं। यूपी ग्रामीण आयुर्विज्ञान और अनुसंधान संस्थान सैफई में भी डायरेक्टर रहे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जापान से फाइबर ऑप्टिक ब्रोंकोस्कोपी और फेफड़ों के कैंसर सहित पल्मोनरी मेडिसिन में उन्नत प्रशिक्षण प्राप्त किया। सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा भारत के मानद सलाहकार रहे हैं। क्षय रोग के क्षेत्र में वह बहुत प्रसिद्ध हैं। डॉ. प्रसाद ने संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम विकसित करके क्षय रोग विभाग को सफलतापूर्वक पल्मोनरी मेडिसिन के रूप में मान्यता प्राप्त विभाग में बदला। उन्हें पल्मोनरी मेडिसिन के जनक के रूप में जाना जाता है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अब तक 80 से अधिक पुरस्कार मिल चुके हैं।

फलित हुआ संत छोटेजी का आशीर्वाद: प्रो.मंगला कपूर

वाराणसी में देश की पहली एसिड अटैक सर्वाइवर के रूप में जानी जाने वाली संगीत सेविका काशी की प्रो.मंगला कपूर ने पद्मश्री के लिए चयनित होने के बाद सबसे पहले अपने प्रेरणास्रोत संत छोटेजी महाराज का स्मरण किया। बोलीं बचपन में उनसे मिला आशीर्वाद चौथेपन में फलीभूत हुआ है। उनका पद ‘जय भोले बाबा तव शरणम्’ मैंने कई बार उनके सम्मुख गाकर आशीर्वाद पाया था। प्रो. कपूर ने बताया कि संत छोटेजी महाराज हमारे घर के पुरोहित थे। बचपन से उन्हें देखती और सुनती रही हूं। वह मेरे गायन की बहुत प्रशंसा करते थे। जब भी आश्रम में कोई आयोजन होता, मुझे अनिवार्य रूप से बुलाया करते थे। जब तक उनका पसंदीदा पद नहीं गा लेती थी तब तक मेरा गायन समाप्त नहीं होता था। गढ़वासीटोला में संत छोटेजी महाराज हमारे पड़ोसी थे। उनकी कृपा के बिना तो मैं अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही हार गई होती। मेरे परिजन बताते हैं मैं बचपन में जितना मधुर गाती थी उतनी ही सुंदर भी थी। दोहरे गुण से मेरे कुछ जानने वालों को ही बहुत जलन थी।

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उन्होंने कहा कि मुझे धोखे से सिंदूर खिलाकर पहले मेरा गला खराब करने की साजिश रची गई। काफी जद्दोजहद के बाद जब मैं उस चुनौती से उबरी तो उन लोगों ने उससे भी खौफनाक कदम उठाया। मेरे ऊपर तेजाब फेंक दिया गया। चेहरे से शरीर के एक तरफ का हिस्सा बुरी तरह जल गया। छह वर्षों तक उपचार के बाद किसी तरह मेरी जान बची। उस समय प्लास्टिक सर्जरी की सुविधा नहीं थी। मुझे थोड़े-थोड़े दिन के बाद पटना जाकर ऑपरेशन कराना पड़ता था। उस दौरान मैं जिस असह्य पीड़ा से गुजरती थी उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकती। इस हादसे से उबरने के बाद मेरे पिताजी मुझे बुलानाला स्थित गुप्ता संगीतालय लेकर जाते थे। वहां अन्य बच्चे मेरा मजाक उड़ाते थे लेकिन गुप्ताजी ने सबको बाहर निकालने की चेतावनी दे दी। मेरे पिताजी मुझे अपने साथ लेकर जाते और क्लास खत्म होने के बाद साथ ही लेकर घर आते। इसके साथ-साथ मेरी पढ़ाई भी जारी रही। बीएचयू से पढ़ाई पूरी करने के बाद यही मुझे संगीत शिक्षण के लिए महिला महाविद्यालय में नियुक्ति मिली।

सीएम योगी ने पद्मश्री विजेताओं को दी बधाई

सीएम योगी ने पद्मश्री विजेताओं को बधाई देते हुए कहा, उनकी विशिष्ट सेवा ने भारत की बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक नींव को मजबूत किया है। एक्स पर हिंदी में एक पोस्ट में, आदित्यनाथ ने कहा, सभी पद्म पुरस्कार विजेताओं को हार्दिक बधाई, जिनकी विशिष्ट सेवा ने भारत की बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक नींव को मजबूत किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कला, विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य, कृषि और खेल के क्षेत्र में उनका समर्पण और उत्कृष्टता हमारे महान राज्य और राष्ट्र के शाश्वत मूल्यों और अपार क्षमता को दर्शाती है। पद्म श्री के लिए अपना नाम घोषित होने पर प्रतिक्रिया देते हुए मंगला कपूर ने पीटीआई से कहा, “यह पुरस्कार मेरे लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि यह देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। इस समय, मैं अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती।

मुरादाबाद के चिरंजी लाल यादव, जो अपने पीतल की नक्काशी के काम के लिए जाने जाते हैं, ने कहा कि वह 1970 से इस कला से जुड़े हुए हैं। पद्म श्री पुरस्कार के लिए अपना नाम आने की खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए अनिल रस्तोगी ने पीटीआई से कहा, “पुरस्कारों के लिए नाम आने पर पहली प्रतिक्रिया निश्चित रूप से खुशी की थी। हालांकि, मैं एक वैज्ञानिक हूं (करियर के दृष्टिकोण से)। मुझे एक शौकिया कलाकार के रूप में पहचान मिली, और यह मेरे लिए गर्व का क्षण है। इसके लिए, मैं अपने सभी सह-कलाकारों, निर्देशकों और सबसे बढ़कर CDRI (सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट) को धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे थिएटर के प्रति इस जुनून को निखारने की अनुमति दी।

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