प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में आवश्यक पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के बिना ईंट-भट्ठों के संचालन पर सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है. कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है. यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने मेरठ के नितिश कुमार व पांच अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
राज्य भर के ईंट-भट्ठों के सर्वे और कार्रवाई की मांग: याचिका में मांग की गई है कि राज्य में ईंट-भट्ठों को आवश्यक मंजूरियां, विशेष रूप से राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) से पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए बिना संचालित न होने दिया जाए. साथ ही ऐसे सभी ईंट-भट्ठों का सर्वे कर बिना वैध पर्यावरणीय मंजूरी संचालित इकाइयों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है. याची की ओर से अधिवक्ता श्रेया त्रिवेदी ने कहा कि ईंट-भट्ठों के लिए मिट्टी की खुदाई पर्यावरण पर सीधा प्रभाव डालने वाली गतिविधि है. इसलिए इसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, पर्यावरण संरक्षण नियम 1986 तथा 14 सितंबर 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के तहत विनियमित किया जाना आवश्यक है.
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेशों के उल्लंघन का आरोप: याची के अधिवक्ता ने 24 जून 2013 के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन तथा हाईकोर्ट के पूर्व आदेश का भी हवाला दिया. बताया गया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 3 नवंबर 2014 को अपने क्षेत्रीय अधिकारियों को परिपत्र जारी कर ईंट-भट्ठे को संचालन की सहमति देने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी की जांच करना अनिवार्य किया था. याची का आरोप है कि इसके बावजूद मेरठ में कई ईंट-भट्ठों को वैध पर्यावरणीय मंजूरी के बिना संचालन की अनुमति दी जा रही है. हाईकोर्ट ने कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी के बिना ईंट-भट्ठों के संचालन को लेकर उठाई गई शिकायत पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है और इसी आधार पर सभी प्रतिवादियों से जवाब तलब किया.
