नामी ई-कॉमर्स कंपनियों के नाम पर बड़ा खेल, लोगों को बनाया शिकार

Sanchar Now
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नोएडा। सेक्टर-63 कोतवाली पुलिस ने नामी ई-कामर्स कंपनियों के माध्यम से सामान बेचने का झांसा देकर फर्जी सर्टिफिकेट बेचने वाले कॉल सेंटर का पर्दाफाश करते हुए गिरोह के सरगना समेत 21 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनमें 16 पुरुष एवं पांच महिलाएं हैं।

एक करोड़ से ज्यादा की कर चुके थे ठगी

पुलिस के अनुसार, आरोपितों के पास से 12 डेस्कटॉप, 12 लैपटॉप, 12 कीबोर्ड, 12 माउस, छह सीपीयू, टैब, 28 मोबाइल बरामद हुए हैं। आरोपित पिछले ढाई वर्ष से किराये की बिल्डिंग में ठगी कर रहे थे। अबतक एक हजार लोगों से एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर चुके हैं।

डीसीपी सेंट्रल नोएडा शक्ति मोहन अवस्थी का कहना है कि साइबर हेल्प डेस्क पर पिछले कुछ समय से सूचना प्राप्त हो रही थी कि सेक्टर-63 डी-247/01 स्थित इन्फोबीम साल्यूशंस नाम की एक कंपनी नामी ई-कामर्स कंपनियां जैसे नायका, ईबे, मिंत्रा, ईटसे आदि के नाम से जाली सर्टिफिकेट बनाकर विक्रेताओं के साथ धोखाधड़ी कर रही है।

इन्होंने की थी शिकायत

ठगी का शिकार हुए श्रुति चौधरी, रश्मि गर्ग, अनुज तिवारी, यशा तैमूरी ने इस मामले की शिकायत सेक्टर-63 कोतवाली में दी थी। सूचना पर सर्टिफिकेट की प्रमाणिकता के संबंध में संबंधित ई-कामर्स कंपनियों को ई-मेल भेजकर जानकारी मांगी गई तो नामी कंपनियों ने कोई भी सर्टिफिकेट जारी करने से इनकार किया। ठगी करने वाली कंपनी को अपना अधिकृत पार्टनर नहीं बताया। ठग कंपनी विक्रेताओं से पैसे लेकर नामी कंपनी का भी नाम खराब कर रही थी।

फर्जी सर्टिफिकेट फ्रेम दीवारों पर लगे मिले

वहीं, पुलिस जब ठग कंपनी के पते पर पहुंची तो वहां नामी ई-कामर्स कंपनियों के फर्जी सर्टिफिकेट फ्रेम दीवारों पर लगे मिले। जिससे ठग कंपनी में आने वाले व्यक्ति को यकीन हो सके कि ठग नामी ई-कामर्स कंपनियों द्वारा उनके प्लेटफॉर्म पर सामान की बिक्री के लिए अधिकृत है। फिर विक्रेता से कहते कि अगर उन्हें नामी ई-कामर्स प्लेटफॉर्म पर अपना सामान बेचना है तो फीस देनी होगी। जिसके बाद वह विक्रेता का सामान ई-कामर्स वेबसाइट पर बिक्री के लिए प्रसारित करा देंगे।

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बताया गया कि झांसे में आए विक्रेता आरोपितों को 15 से 20 हजार रुपये देते थे। बावजूद आरोपित न तो उनका सामान नामी ई-कामर्स साइट पर प्रसारित करते थे और न पैसे वापस करते थे। जांच पर पता चला चला है कि नामी कंपनी पर कोई भी सामान बेचने के लिए कोई फीस नहीं ली जाती थी। लेकिन विक्रेताओं को जाली सर्टिफिकेट की प्रति व्हाट्सएप व अन्य इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर भेजकर झांसे में लेते थे।

एनसीआर के बाहर रहने वाले लोगों को बनाते थे निशाना

एडिशनल डीसीपी हृदेश कठेरिया का कहना है कोई अपना पैसा वापस मांगने के लिए इन पर दबाव न डाले इसलिए आरोपित अधिकांश रूप से एनसीआर के बाहर और गैर राज्य के लोगों को अपना शिकार बनाते थे। जिससे वह यहां आकर कोई शिकायत ना कर सके। सभी फर्जी सर्टिफिकेट एवं अन्य डाटा ठग कंपनी के निदेशक जोगेंद्र, गुंजन कात्याल व आकाश शर्मा द्वारा तैयार कर अपने कर्मचारियों को भेजा जाता था।

इसके बाद कॉल सेंटर के कर्मचारी विक्रेता को फोन करके फर्जी सर्टिफिकेट व्हाट्सएप पर भेजकर प्रलोभन देकर ठगी करते थे। ठगी का पैसा आपस में बांटते थे। बाकी कर्मचारियों को 10 से 15 हजार रुपये के प्रतिमाह के वेतन पर रखा था। जिनका काम विक्रेता को फोन करने के साथ-साथ इंटरनेट मीडिया फेसबुक, व्हाट्सएप, एक्स, इंस्टाग्राम के माध्यम से झांसे में लेना था।

यूपी, दिल्ली, बिहार, राजस्थान, हिमाचल के रहने वाले हैं ठग

आरोपितों की पहचान मुजफ्फरनगर जोगेंद्र कुमार, औरैया के गोपाल सक्सेना, मथुरा के रेयांश शर्मा, सहारनपुर के अखिल गर्ग, गाजियाबाद के आकाश शर्मा, निशांत, आकाश यादव, मुकुल त्यागी, पूर्ति, बुलंदशहर के रवि कुमार, लोकेश चौधरी, संभल के प्रदीप कुमार, अमरोहा की गुंजन चौहान, बिसरख के कार्तिक मिश्रा, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के अनिल कुमार, कैमूर बिहार के पंकज उपाध्याय, झुंझुनू (राजस्थान) के हिमांशु शर्मा, दिल्ली के सरस भारद्वाज, गुंजन कात्याल, स्वीटी व लखनऊ की मोनिका वर्मा के रूप में हुई है।

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