चप्पल पहनकर मंदिर पहुंचा दलित दूल्हा, दबंगों ने कर दी पिटाई, दुल्हन के साथ भी की धक्का-मुक्की

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महोबा (अमित श्रोतीय ): जहां देश चांद पर बसने की तैयारी कर रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में आज भी जातिवादी मानसिकता और सामंतवादी सोच ने मानवता को शर्मसार कर दिया है। महोबा जिले के अजनर थाना क्षेत्र के मवईया गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न सिर्फ दलित समुदाय को झकझोर दिया, बल्कि पूरे क्षेत्र में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है। दूल्हा दुल्हन के सिर्फ चप्पल पहनकर दरवाजे से निकलने पर भड़के दबंगों ने मारपीट कर दी।

ठाकुर समाज के लोगों पर मारपीट का आरोप

दरअसल, गांव के निवासी सुनील नामक युवक पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत अपनी नवविवाहिता पत्नी को लेकर गांव के मंदिर में जा रहा था, तब उसे रास्ते में जातीय उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। आरोप है कि गांव के ठाकुर समाज के दबंगों ने रास्ते में चारपाई डालकर उन्हें रोका और चप्पल पहनकर ऊंची जाति के दरवाजे से गुजरने को लेकर आपत्ति जताई। जब सुनील ने इसका विरोध किया तो आरोपियों ने न सिर्फ उसे जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया बल्कि बर्बर तरीके से मारपीट भी की। इस हमले में सुनील के साथ आए उसके परिजन अजय और कल्ला भी घायल हो गए। पीड़ितों का आरोप है कि नवविवाहिता के साथ भी धक्का-मुक्की की गई और उसे अपमानित करने की कोशिश की गई।

पीड़ित परिवार पर ही सुलह समझौते का दबाव बना रही पुलिस

घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन पीड़ितों के मुताबिक न तो मेडिकल परीक्षण कराया गया और न ही अब तक किसी आरोपी की गिरफ्तारी हुई है। उल्टा पीड़ित परिवार पर राजीनामा का दबाव बनाया जा रहा है। पीड़ित सुनील का कहना है कि दबंगों की खुलेआम गुंडागर्दी के बावजूद पुलिस का रवैया अत्यंत निराशाजनक है। उन्होंने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगाई और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

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 आरोपियों पर पुलिस ने लगाई  मामूली धारा

वहीं इस मामले में सीओ कुलपहाड़ हर्षिता गंगवार ने कहा कि मामला संज्ञान में है और आरोपियों के खिलाफ शांति भंग की धारा 151 के तहत कार्रवाई की गई है। आगे की जांच जारी है और आवश्यक विधिक कार्रवाई की जाएगी। इस शर्मनाक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि समाज में जातिवादी सोच आज भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है। पीड़ित परिवार को अब भी न्याय की आस है, और यह देखना बाकी है कि प्रशासन इस सामाजिक अन्याय पर कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है।

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