ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में दशहरा को नहीं होता रावण दहन, यहां होती है राम और रावण दोनों की पूजा

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संचार नाउ। विजयदशमी को पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाते हैं, रामलीला का आयोजन होता है। लेकिन दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर ग्रेटर नोएडा का बिसरख गांव इस परंपरा से बिल्कुल अलग है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां रावण का जन्म हुआ था। यही कारण है कि यहां दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। मंदिर के महंत रामदास ने बताया कि बिसरख रावण की जन्मभूमि है। इसी गांव का नाम भी रावण के पिता विसर्वा ऋषि के नाम पर पड़ा। कहा जाता है कि यहीं पर रावण ने कठोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। इस मंदिर में अष्टभुजा शिवलिंग की स्थापना भी यहां ब्रह्मा और पुलस्त्य मुनि ने की थी।

दरअसल, इस मंदिर परिसर की विशेषता यह है कि यहां राम-लक्ष्मण-सीता की प्रतिमाओं के साथ ही एकमुखी रावण की प्रतिमा भी विराजमान है। रोजाना इन सभी की पूजा-अर्चना की जाती है। दशहरे के दिन भी यहां पूजा होती है, लेकिन रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। महंत के अनुसार, रावण जन्म से एक ही मुख (शीश) था। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए 10 बार अपना शीश काटकर भेंट किया था। प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें दसों सिर वापस लौटा दिए। तभी से रावण दशानन कहलाए।

वही गांव के लोगों का मानना है कि यह स्थान केवल रावण से ही नहीं, बल्कि राम से भी जुड़ा है। इसलिए यहां दशहरे पर राम और रावण दोनों की पूजा की जाती है। हालांकि, बिसरख में रामलीला का आयोजन नहीं होता। कुछ वर्ष पहले दो बार प्रयास किए गए, लेकिन बीच में ही आयोजन रोकना पड़ा।

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खबर के दौरान पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि यहां किसी तरह की भ्रांति या अफवाह से अलग राम और रावण दोनों की पूजा परंपरा के रूप में होती है। बिसरख के लोग दशहरा तो मनाते हैं, लेकिन यहां का संदेश अलग है—जीवन में अच्छाई और बुराई दोनों के अस्तित्व को समझते हुए संतुलन बनाए रखना ही सच्चा धर्म है। बिसरख की यह परंपरा आज भी पूरे देश में अलग पहचान बनाए हुए है।

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