इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में लापरवाही और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से न्यायिक आदेशों की अनदेखी पर नाराजगी जताई है। कहा कि अब समय आ गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीनस्थों की गलतियों और लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर की।
झांसी निवासी ने 15 वर्षीय बेटी को अवैध हिरासत से मुक्त कराने की मांग में याचिका दायर की थी। मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया संतोषजनक नहीं पाई गई थी। कोर्ट के आदेश के बाद भी चार्जशीट दाखिल करने से पहले अभियोजन अधिकारी से समीक्षा नहीं कराई गई।
कोर्ट ने कहा कि जांच के संबंध में दिए गए निर्देशों को कई जिलों में पालन नहीं किया जा रहा। कोर्ट ने पाया कि सरकारी अधिकारियों का रवैया केवल न्यायिक आदेशों को टालने और सुप्रीम कोर्ट में अपील का बहाना बनाकर कार्यवाही से बचने का रहा। कोर्ट ने कहा कि लोक सेवक सरकार के विभागों का संचालन करते हैं। ऐसे में अगर वे अपने कर्तव्यों का पालन निष्पक्षता से नहीं करते हैं तो यह जनता के विश्वास का अपमान है।
कोर्ट ने वरिष्ठों की जिम्मेदारी के सिद्धांत को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अनुसार कोई अधीनस्थ अधिकारी अपराध रोकने में विफल रहता है या जांच में लापरवाही करता है तो उसका वरिष्ठ अधिकारी भी अपनी नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग भारत सरकार को भेजी जाए। संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के भविष्य के दायित्यों के निर्धारण और पदोन्नति के समय उनके पिछले रिकॉर्ड और न्यायिक टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाए। हालांकि, नाबालिग लड़की की सकुशल बरामदगी के बाद याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
