प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मोहम्मदिया कानून के तहत तलाक उसी तारीख से प्रभावी होता है, जिस दिन पति इसका ऐलान करता है. अदालत ने कहा कि बाद में प्राप्त होने वाला अदालती आदेश केवल उस तलाक की पुष्टि करने वाली एक घोषणा मात्र है. न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने हुमायरा रियाज़ की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. बेंच ने साफ किया कि कोर्ट का आदेश फैसले की तारीख से कोई नया तलाक पैदा नहीं करता, बल्कि यह मूल घोषणा की तारीख से ही लागू माना जाता है.
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द: हाईकोर्ट ने प्रयागराज परिवार न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक महिला की भरण-पोषण की अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी. परिवार न्यायालय ने तर्क दिया था कि महिला की दूसरी शादी के समय उसका पहला तलाक कानूनी रूप से पूर्ण नहीं था, इसलिए दूसरी शादी अमान्य है. हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पहले पति ने फरवरी 2005 में ही तलाक का ऐलान कर दिया था. पत्नी के वकील ने दलील दी कि 2013 का अदालती आदेश केवल 2005 में हुए उसी तलाक को वैध घोषित करने के लिए था.
तकनीकी आधार पर हक से वंचित नहीं की जा सकती महिला: सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि महिला ने अपनी ‘इद्दत’ की अवधि पूरी करने के बाद मई 2012 में दूसरी शादी की थी. कोर्ट ने माना कि किसी भी महिला को शादी की वैधता से जुड़ी तकनीकी आपत्तियों के आधार पर भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. खासकर तब, जब पति ने पूरी जानकारी के साथ शादी की हो और दोनों पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रहे हों. पति के वकील की उस दलील को कोर्ट ने खारिज कर दिया कि 2013 के आदेश से पहले की गई शादी अवैध है.
फैमिली कोर्ट को दोबारा सुनवाई के आदेश: अदालत ने कहा कि परिवार न्यायालय द्वारा अपनाया गया तरीका स्थापित कानूनी स्थिति के अनुरूप नहीं था. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति खुद तलाक देता है और बाद में डिक्री के लिए कोर्ट जाता है, तो वह डिक्री केवल पुराने तलाक की पुष्टि करती है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि जहां तलाक की वैधता पर विवाद हो, वहां ट्रायल कोर्ट को सबूतों की गहराई से जांच करनी चाहिए. अब इस मामले को गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए वापस परिवार न्यायालय भेज दिया गया है.
