संचार नाउ, सोनीपत। एक पिता अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करता है। अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, दिन-रात मेहनत करता है और यही सपना देखता है कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर जीवन में सफल बनें। लेकिन जब वही पिता अपनी अंतिम यात्रा पर हो और उसकी संतानें कंधा देने तक न पहुंचें, तब यह घटना केवल एक परिवार की नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है।
दरअसल, अपने समय के मुंबई में करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा करने वाले हरियाणा के ककरोई गांव निवासी शिवचरण गुप्ता ने अपनी तीनों बेटियों को पढ़ाया-लिखाया और शिक्षक बनाया। आनंद आश्रम के संचालक ने बताया कि इनको तीनो बेटियां नेपाल, मुंबई और उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ सहित तीनो अलग-अलग शहरों में अपने परिवार और पेशेवर जीवन में स्थापित हैं। लेकिन जब पिता की अंतिम विदाई का समय आया, तब तीनों बेटियां अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुईं। बताया गया कि मुंबई में रहने वाली बेटी ने 51 सौ रुपये भेज दिए जबकि नेपाल में रहने वाली बेटी ने वीडियो कॉल के माध्यम से अंतिम संस्कार देखने की बात कही, जबकि समाजसेवियों ने उनका अंतिम संस्कार कराया। यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों पर गंभीर चिंतन का विषय बन गई है।
क्या केवल डिग्री ही शिक्षा है?
शिक्षक को समाज का मार्गदर्शक माना जाता है। वही बच्चों को ज्ञान, नैतिकता, कर्तव्य और संस्कार सिखाता है। लेकिन जब शिक्षक स्वयं अपने माता-पिता के प्रति अपने सबसे बड़े दायित्व को निभाने में पीछे रह जाए, तो समाज के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। जो शिक्षक बच्चों को परिवार के सम्मान, माता-पिता की सेवा और संस्कारों का पाठ पढ़ाते हैं, क्या वे स्वयं उन मूल्यों का पालन कर रहे हैं? यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए विचारणीय है।
क्या सफलता का यही अर्थ है?
एक पिता ने जीवनभर मेहनत कर बेटियों को ऊंची शिक्षा दी, आत्मनिर्भर बनाया और बेहतर जीवन दिया। लेकिन जब अंतिम समय में अपने पिता को अंतिम विदाई देने का अवसर आया, तब वे साथ नहीं थीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आर्थिक सफलता, नौकरी और व्यस्त जीवन, माता-पिता के अंतिम कर्तव्य से भी बड़ा हो सकता है?
क्या आधुनिकता ने रिश्तों को कमजोर कर दिया?
आज माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर स्कूल, कॉलेज और करियर देने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। लेकिन यदि शिक्षा के साथ संवेदनाएं, कर्तव्य और पारिवारिक संस्कार कमजोर पड़ जाएं, तो ऐसी सफलता का मूल्य क्या रह जाता है? समाज को यह आत्ममंथन करना होगा कि हम अपने बच्चों को केवल सफल बना रहे हैं या उन्हें संवेदनशील इंसान भी बना रहे हैं।
समाज के लिए संदेश
इस घटना ने पूरे समाज को झंझोड़ कर रख दिया है यह घटना किसी एक व्यक्ति विशेष के साथ-साथ समाज में एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल नौकरी या ऊंचा पद नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां और संस्कार भी हैं। माता-पिता के प्रति सम्मान और उनके अंतिम समय में साथ खड़े रहने का मूल्य किसी भी उपलब्धि से बड़ा माना जाता है। यह घटना शायद इसी सवाल के साथ खत्म होती है—क्या हम अपने बच्चों को सिर्फ सफल बना रहे हैं, या उन्हें ऐसा इंसान भी बना रहे हैं जो अपने माता-पिता के प्रति अपना कर्तव्य निभा सके?
