‘विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि योद्धा थे’, मोहन भागवत ने विस्थापितों के संघर्ष को सराहा

Sanchar Now
4 Min Read

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने नागपुर में सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के कार्यक्रम में संबोधन करते हुए कहा कि राजनीति का चरित्र ऐसा है कि किसी का अच्छा होता है तो जलने वाले अफराद पैदा होते हैं। मोहन भागवत ने इस दौरान बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आए लोगों के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि जो लोग अपना सबकुछ छोड़कर पाकिस्तान से भारत आए वो शरणार्थी नहीं थे बल्कि विस्थापित थे। आइए जानते हैं कि मोहन भागवत ने इस बारे में और क्या कुछ कहा है।

रोने वाला आदमी पहले ही हार जाता है- मोहन भागवत

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि “जिनका सब कुछ उजड़ गया, जिनके पास कुछ नहीं है, एक तो कुछ नहीं है इसलिए रोते-रोते ये लोग लोग नहीं बैठे, सब कुछ गवां के यहां आए, फिर से यहां पर खड़ा किया। मनुष्य को प्रस्थिति के सामने, नियति के सामने रोना नहीं चाहिए, प्रयास करना चाहिए, प्रयास करने से सब ठीक होता है। प्रतीक्षा करनी पड़ती है, रोने वाला आदमी पहले ही हार जाता है लड़ने के पहले। जो लड़ाई करता है, कुछ ना कुछ हासिल करता है। इसलिए जीवन में सदा हारना नहीं, भागना नहीं।”

डटे रहना, अड़े रहना, संघर्ष करना- मोहन भागवत

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि “भगवान ने गीता में अर्जुन को बताया है कि भागने से तुम्हारी अप कृती होगी, लड़ोगे-जीतोगे तो वैभव मिलेगा, मारोगे तो ऐसी गति मिली जो बड़े-बड़े योगियो को भी नहीं मिलती। डटे रहना, अड़े रहना, संघर्ष करना, इसमें नुकसान नहीं है। भागना, हारना, निराश होना इसमें नुकसान है। यह जीवन का भाग है, हारना नहीं, एक दरवाजा बंद होता है तो, दूसरा दरवाजा कहीं खुलता है।”

पढ़ें  सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को सिर्फ इसलिये नहीं पलट सकते... क्यों बोले CJI चंद्रचूड़?

वे शरणार्थी नहीं, विस्थापित थे- मोहन भागवत

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि “लोगों ने सब कुछ छोड़कर यहां आना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि उनको उस जमीन पर रहना था जो भारत है। उस जमीन पर रहना था जहां वह अपने धर्म का आचरण निर्भरता से कर सकते है। पीढ़ियों से कमाई, संपत्ति, व्यवसाय ,खेती, सब छोड़कर लोग यहां आए, वह शरणार्थी नहीं थे, विस्थापित जरूर थे। उनके लिए गलत शब्द का उपयोग हुआ उस समय। वो तो अपनी मातृभूमि के प्रेम के कारण, धर्म प्रेम के कारण, संघर्षरत योद्धा थे, एक लड़ाई हार गए थे। हम सब लोग लड़ाई हार गए थे, भारत को एक रखने की, लेकिन क्या चुना? कैरियर नहीं चुना, संपत्ति नहीं चुनी, देश चुना, धर्म चुना, क्योंकि जैसा मैंने कहा कि दशा बदलती है, प्रस्थिति आती है, प्रस्थिति जाती है।”

पेट भरने वाली शिक्षा अनिवार्य नहीं- मोहन भागवत

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत में कहा कि “पेट भरने वाली शिक्षा आवश्यक तो है, लेकिन अनिवार्य नहीं है। बिना शिक्षा के भी लोग बड़े होते हैं और शिक्षित लोगों को नौकरी पर रखते हैं। विवेक प्राप्त करने के लिए वास्तव में शिक्षा है, घर से शुरू होती है। पहली टीचर माता है। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में आगे कहा कि “पूरी मानव जाति को एम इन लाइफ देना है। जीना अपने लिए नहीं जीना है, अपनों के लिए,स्वयं नेकी से जीना है। और सबको नेकी सीखानी है बोलकर नहीं, कीर्ति से सीखानी है, यही अपने यहां जीवन की रीति मानी जाती है।

Share This Article
Follow:
Sanchar Now is Digital Media Platform through which we are publishing international, national, states and local news mainly from Western Uttar Pradesh including Delhi NCR through Facebook, YouTube, Instagram, Twitter and our portal www.sancharnow.com
Leave a Comment