उत्तर प्रदेश में कानून के राज, नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट बख्शने की मूड में नहीं दिख रहा है. हाईकोर्ट ने नोएडा के मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने वाली 25 वर्षीय दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से ग्रेजुएट आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को रद्द कर दिया है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर जमकर बरसी है. उन्होंने कहा कि यदि पुलिस और नौकरशाही इसी तरह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तर प्रदेश एक ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ (Orwellian Dystopia) में तब्दील हो जाएगा. बेंच की कथन को आसान भाषा में समझें तो एक ऐसा जगह जहां तानाशाही सरकार/शासन आमलोगों के विचारों, व्यवहार और जानकारी पर पूरी नियंत्रण रखती है.
यह पूरा मामला पांच महीने पहले नोएडा में हुए मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है. इस आंदोलन के बाद पुलिस ने बड़े पैमाने पर क्रैकडाउन करते हुए 15 एफआईआर दर्ज की थीं. इसमें सैकड़ों लोगों को नामजद किया गया था. कम से कम 60 लोगों को जेल भेजा गया था. इस कार्रवाई की चपेट में एक राजमिस्त्री से लेकर हिस्ट्री मेजर, एनआईटी ग्रेजुएट और प्राइवेट फर्म के कर्मचारी तक आए थे. इसीमें 25 वर्षीय डीयू ग्रेजुएट आकृति चौधरी को भी एनएसए के तहत हिरासत में ले लिया गया था.
जमकर बरसा कोर्ट
2 सितंबर को 15-पेज के आदेश में कोर्ट ने साफ किया कि जब ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अपने शपथ के अनुकूल आचरण करती है, तो नागरिक उनका सम्मान करते हैं. लेकिन इसके विपरीत कार्य करने पर वे जनता के बीच ब्रिटिश साम्राज्य के एक उत्पीड़क अवशेष के रूप में देखे जाते हैं, जिससे समाज में अस्वस्थ माहौल और सिविल अनरेस्ट पैदा होता है. कोर्ट ने नजरबंदी का आदेश पारित करने वाली गौतम बुद्ध नगर के डीएम के रवैये को उपहास के योग्य बताया है.
कोर्ट की टिप्पणी –
एक ऐसे मामले में जहां पुलिस की रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के खिलाफ बिना किसी ठोस सबूत के केवल आरोप लगाए गए थे, डीएम से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे सतर्क रहें और यह जांचने के लिए रिकॉर्ड का बारीकी से जांच करें कि क्या आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री है या नहीं.’
बिना सबूत के लगाया एनएसए
कोर्ट ने आगे कहा कि डीएम को यह भी देखना चाहिए था कि क्या बिना किसी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड वाली एक महिला छात्र एक्टिविस्ट, जो मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठा रही थी, उसके खिलाफ सामान्य कानून पर्याप्त नहीं थे? रिकॉर्ड पर ऐसे कोई सबूत नहीं थे जिससे साबित हो कि उसने किसी भी तरह से हिंसा भड़काई हो. इसके विपरीत सबूत से यह साफ होता है कि जिला मजिस्ट्रेट केवल याचिकाकर्ता को एक मिसाल की तरह पेश करना चाहते थे ताकि अन्य लोग मजदूरों के समर्थन में आने से पहले डरें. कोर्ट ने कहा कि गौतम बुद्ध नगर के डीएम अपने शपथ का उल्लंघन करने के दोषी हैं.
डीएम और एसएचओ की सैलरी से वसूला जाएगा 5 लाख का जुर्माना
नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करने लापरवाह अफसरों पर कोर्ट जमकर बरसा है. दोनों जस्टिस की खंडपीठ ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. यह राशि सीधे तौर पर गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट – जिन्होंने बिना किसी दिमाग का इस्तेमाल किए नजरबंदी का यह आदेश दिया और इसके लिए जिम्मेदार अन्य सभी अधिकारियों, नीचे एसएचओ (SHO) तक के वेतन से वसूल की जाएगी.
आईएएस और आईपीएस की वफादारी केवल संविधान के प्रति
कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों और नागरिकों के बीच के संबंधों पर भी विस्तार से बात की है. कोर्ट ने कहा कि ये अधिकारी देश के युवाओं में से सबसे बेहतरीन प्रतिभाओं को चुनकर आते हैं, जो कठिन चयन प्रक्रिया के बाद इन पदों को संभालते हैं. सेवा में आने से पहले वे शपथ लेते हैं कि वे भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखेंगे. अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि उनकी वफादारी राजनीतिक कार्यकारी मतलब नेताओं और सरकार के प्रति नहीं, बल्कि उस संविधान और देश की जनता के प्रति है, जिनके वे सेवक हैं.
कवि रुडयार्ड किपलिंग के शब्दों में –
‘जिम्मेदारी के बिना सत्ता युगों से वेश्या का विशेषाधिकार, यह बात तब सच साबित होती है जब नौकरशाही द्वारा लापरवाही से और मानवीय संवेदनाओं से रहित होकर सत्ता का प्रयोग किया जाता है, जिसके नागरिकों के लिए गंभीर परिणाम होते हैं.’
आंदोलन प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व की तरह होता है
अदालत ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि हर समाज में अपनी आंतरिक टेंशन और सरकार के कामकाज के तरीकों से असहमति होती है:
आंदोलनों की अनुमति देना प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व की तरह है, जो यह सुनिश्चित करता है कि दबाव अंदर घुटने के बजाय बाहर निकल आए. इसके विपरीत, ऐसे आंदोलनों को रोककर रखना और भावनाओं को अंदर ही घोंटकर रखना अंततः सड़कों पर ऐसी हिंसा को जन्म देता है जिसे नियंत्रित करना कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए मुश्किल हो जाता है.’
NSA कोई शॉर्टकट या विकल्प नहीं है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत किसी को भी नजरबंद करना एक अपवाद है, न कि इस बात का विकल्प कि यदि कोई व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर जमानत पा रहा है, तो राज्य उसे किसी गढ़ी हुई दलील के सहारे जेल में रोके रखे. संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा दिए गए अधिकारों का हनन करने वाली इस तरह की शक्तियों का प्रयोग अनुमानों, पूर्वाग्रहों, अटकलों और केवल व्यक्तिगत राय के आधार पर हल्के में नहीं किया जा सकता.
