आख़िर कौन है देवेंद्र बल्हारा ? एक विचार, एक आंदोलन, एक विकल्प

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संचार नाउ। आज जब शिक्षा, रोज़गार और अर्थव्यवस्था को लेकर देश में असमंजस और दबाव का माहौल है, तब एक नाम लगातार चर्चा में है—देवेंद्र बल्हारा। लोग पूछते हैं कि आखिर देवेंद्र बल्हारा कौन हैं? उनका संघर्ष, सोच और आंदोलन क्या है? इसका जवाब उनकी असाधारण यात्रा में छिपा है। हरियाणा के करनाल ज़िले के असंध क्षेत्र के गाँव फफड़ाना में जन्मे देवेंद्र बल्हारा एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। प्रारंभ से ही समाज, शिक्षा और मानव जीवन को लेकर उनका नजरिया सामान्य सोच से अलग रहा।

शिक्षक से सिस्टम को चुनौती देने तक
देवेंद्र बल्हारा पेशे से सरकारी शिक्षक रहे हैं। लेकिन वे मानते थे कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था बच्चों को केवल डिग्री देती है, जीवन और रोज़गार नहीं। इसी सोच के चलते उन्होंने वर्ष 2012 में अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ दी।

हर बच्चा खास, यही उनकी शिक्षा की सोच
उनका स्पष्ट मानना है कि हर बच्चा भगवान की तरफ़ से एक विशेष उद्देश्य के साथ जन्म लेता है। अगर उसकी प्रतिभा को पहचाना जाए, तो ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाई जा सकती है जो 100 प्रतिशत रोज़गार दे और समाज को अपराध, डिप्रेशन और गला-काट प्रतियोगिता से मुक्त कर सके।

कोचिंग सिस्टम से मोहभंग
सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने कोचिंग के माध्यम से शिक्षा सुधारने की कोशिश की, लेकिन अनुभव से समझ आया कि कोचिंग सिस्टम किसी भी देश के भविष्य के लिए घातक है। इसी कारण 2016 में उन्होंने कोचिंग सेंटर भी बंद कर दिया।

गाँव-गाँव जाकर शिक्षा और रोज़गार की अलख
कोचिंग बंद करने के बाद देवेंद्र बल्हारा गाँव-गाँव जाकर लोगों को रोज़गार देने वाली शिक्षा व्यवस्था के प्रति जागरूक करने लगे। उनका फोकस शहरों से हटकर ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाना रहा।

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वैश्विक एजेंडों का खुला विरोध
इस दौरान उन्होंने New World Order, जबरन वैक्सीनेशन, मास्क और लॉकडाउन जैसी नीतियों का खुलकर विरोध किया। अपनी बेबाक राय और सवाल उठाने की वजह से उन्हें 3 जनवरी 2022 को जेल भी जाना पड़ा।

जनता सरकार मोर्चा की स्थापना
जेल से रिहा होने के बाद 24 जनवरी 2022 को उन्होंने “जनता सरकार मोर्चा” का गठन किया। इसका उद्देश्य भारत को भारतीय सोच, भारतीयता और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित व्यवस्था से जोड़ना है।

कर्जमुक्त भारत अभियान की शुरुआत
जब उन्हें यह समझ में आया कि भारतीय रुपये की संरचना और बैंकिंग सिस्टम के ज़रिए आम जनता का आर्थिक शोषण हो रहा है। इसके खिलाफ उन्होंने देशव्यापी “कर्जमुक्त भारत अभियान” शुरू किया, जिसका लक्ष्य हर कर्जदार को आर्थिक आज़ादी दिलाना है।

किताबें और वैचारिक योगदान
कर्जमुक्त भारत अभियान के तहत उन्होंने एक किताब देश को समर्पित की है। इसके अलावा वे “Parenting and Education” विषय पर एक और पुस्तक लिख रहे हैं, जो जल्द प्रकाशित होने की संभावना है।

2026 से शिष्यकुल का सपना
देवेंद्र बल्हारा का अगला बड़ा कदम “शिष्यकुल” की स्थापना है। प्रस्ताव के अनुसार हर गाँव से दो बच्चों को चुनकर उन्हें जीवन, समाज और रोज़गार के लिए तैयार किया जाएगा। पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके रोज़गार की ज़िम्मेदारी भी संस्था की होगी।

एक व्यक्ति नहीं, एक आंदोलन
देवेंद्र बल्हारा आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि शिक्षा, रोज़गार और आत्मनिर्भर भारत की सोच को आगे बढ़ाने वाला एक वैचारिक आंदोलन बन चुके हैं। उनकी यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो सिस्टम के भीतर रहकर नहीं, बल्कि सिस्टम को बदलकर समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं।

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