बुलडोजर ऐक्शन और पाक्सो पर हाईकोर्ट के दो जज आपस में ही बंटे, सीजे को भेजा गया मामला

Sanchar Now
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने हमीरपुर जिले में बुल्डोजर कार्रवाई व पाक्सो एक्ट के बहुचर्चित मामले में मतभिन्नता के कारण सुनवाई को तीसरे जज के लिए रेफर कर दिया है. यह मतभिन्नता फैमुद्दीन एवं अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ के आदेश में आई. इस याचिका में संपत्ति सील करने और ध्वस्तीकरण की आशंका को लेकर संवैधानिक संरक्षण मांगा गया था. याचियों का कहना था कि उनकी रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और पॉक्सो एक्ट समेत यूपी गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज है.

बिना नोटिस सीलिंग और ध्वस्तीकरण का आरोप: आरोप है कि आफान खान का याचियों की आवासीय संपत्तियों, इंडियन लॉज नामक व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आरा मिल में कोई मालिकाना हक नहीं है. इसके बाद भी प्रशासन द्वारा बिना नोटिस या सुनवाई के इन संपत्तियों को सील करने और ध्वस्त करने की कार्रवाई की जा रही है. याचियों ने इसे सामूहिक दंड और भीड़तंत्र जैसी राजनीतिक रूप से संरक्षित कार्रवाई बताते हुए अदालत से गुहार लगाई थी. दूसरी तरफ सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि इस याचिका में कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हैं.

सरकारी वकील ने कोर्ट में रखी दलीलें: सरकारी वकील के मुताबिक इंडियन लॉज सिंचाई विभाग की जमीन पर बना है और 2021 की एक जनहित याचिका में इस अतिक्रमण को हटाने के आदेश पहले से ही प्रभावी हैं. आपराधिक मामले के संदर्भ में बताया गया कि एक 16 वर्षीय नाबालिग के साथ रेप, आपत्तिजनक वीडियो बनाने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने का गंभीर आरोप है. अभियोजन के अनुसार यह पूरी घटना इसी विवादित इंडियन लॉज के भीतर ही अंजाम दी गई थी. जांच में याची फैमुद्दीन की भूमिका भी सामने आई है और उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है.

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बुलडोजर कार्रवाई पर जस्टिस श्रीधरन का रुख: आरा मिल पर वन विभाग की ओर से अलग कार्रवाई चल रही है क्योंकि वहां से प्रतिबंधित और संरक्षित प्रजाति की लकड़ी बरामद हुई थी. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर जजमेंट का विशेष हवाला दिया. उन्होंने कहा कि किसी आरोपी के घर को केवल इसलिए ध्वस्त करना कि उस पर आपराधिक मामला दर्ज है, प्रतिशोधात्मक कार्यकारी विवेकाधिकार माना जाएगा. उन्होंने निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक किसी आरोपी का घर तब तक ध्वस्त न किया जाए जब तक कि सार्वजनिक भूमि पुनः प्राप्त करने की तत्काल आवश्यकता न हो.

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने जताई असहमति: उन्होंने यह भी जोड़ा कि कोई व्यक्ति तीन वर्ष या उससे अधिक समय से अवैध निर्माण में रह रहा है तो प्राधिकरण को कार्रवाई से एक वर्ष पहले सूचना देनी होगी ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके. हालांकि खंडपीठ में शामिल दूसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने जस्टिस श्रीधरन के इस फैसले से आंशिक असहमति जताई. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को दो साल जैसी कोई निश्चित समयसीमा तय करने का कानूनी अधिकार नहीं है. उनका मानना था कि इस तरह की छूट का दुरुपयोग हो सकता है और लोग कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर तुच्छ मुकदमे या एफआईआर दर्ज करा सकते हैं.

लापरवाह अधिकारियों पर भी हो कड़ी कार्रवाई: जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इसे अवांछित न्यायिक सक्रियता और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताते हुए एक वर्ष के नोटिस वाली शर्त को भी अस्वीकार कर दिया. हालांकि दोनों न्यायाधीश इस बात पर पूरी तरह सहमत रहे कि निर्माण उल्लंघन को लेकर अगर नोटिस जारी होता है तो दोषी अधिकारियों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत समानांतर कार्रवाई शुरू होनी चाहिए. उन्होंने माना कि विकास प्राधिकरण की कार्रवाई किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध चुनिंदा नहीं होनी चाहिए अन्यथा पीड़ित पक्ष अदालत का रुख कर सकता है. फैसले में सुपरटेक मामले का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अवैध निर्माणों के लिए अकेले उल्लंघनकर्ता ही नहीं बल्कि निर्माण को मंजूरी देने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी उतने ही जिम्मेदार हैं.

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मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा मामला: कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ आम नागरिक के अवैध निर्माण को गिराना पर्याप्त नहीं बल्कि लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई जरूरी है. दोनों न्यायाधीशों के बीच दो अहम कानूनी बिंदुओं पर मतभिन्नता रही, जिसमें पहला बिंदु दो साल की सामान्य रोक लगाने और दूसरा बिंदु नगरीय कानून के तहत कार्रवाई से एक साल पहले नोटिस ऑफ इंटेंट देने की अनिवार्यता से जुड़ा है. इस मतभेद के कारण अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा, जो इसे किसी तीसरे न्यायाधीश या पीठ को सौंपेंगे. तब तक याचियों की आवासीय संपत्ति को लेकर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं है जबकि आरा मिल के विरुद्ध वन अधिनियम के तहत कार्रवाई यथावत जारी रहेगी.

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