संचार नाउ। विकास की नींव रखने वाले किसानों की पीड़ा एक बार फिर सामने आई है। करीब तीन दशक से किसान 4 प्रतिशत अतिरिक्त आबादी भूखंड की मांग को लेकर भटक रहे हैं, लेकिन आज तक उन्हें उनका अधिकार नहीं मिल सका।
दरअसल, नवंबर 1997 में तत्कालीन प्राधिकरण अध्यक्ष द्वारा आदेश जारी कर किसानों को उनकी अर्जित भूमि के बदले 10 प्रतिशत आबादी भूखंड देने की बात कही गई थी। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका संख्या 37443 (राजेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) में कोर्ट ने स्पष्ट आदेश देते हुए किसानों को 64.7 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा और 10 प्रतिशत विकसित आबादी भूखंड देने के निर्देश दिए।
इसके बावजूद प्राधिकरण स्तर पर लिए गए फैसले भी कागजों तक ही सीमित रह गए। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की 91वीं, 104वीं और 133वीं बोर्ड बैठक में इस विषय पर निर्णय लिया गया, लेकिन अब तक उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा।
बताया जा रहा है कि करीब 230 हेक्टेयर भूमि इस योजना के लिए चिन्हित की गई थी, जिसके बदले किसानों से 965 रुपये प्रति वर्ग मीटर विकास शुल्क लिया जाना प्रस्तावित था। वहीं, अक्टूबर 2023 के शासनादेश में 237 मामलों को वापस लेकर 133वीं बोर्ड बैठक के प्रस्ताव संख्या 26 के तहत किसानों को 4 प्रतिशत अतिरिक्त भूखंड देने की बात कही गई।
एडवोकेट विनोद कुमार वर्मा ने मुख्यमंत्री से निवेदन करते हुए कहा है कि इस पूरे प्रकरण में प्राधिकरण से आख्या तलब की जाए और किसानों को उनका वैधानिक अधिकार दिलाया जाए। आज स्थिति यह है कि जिस अन्नदाता ने विकास के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन प्राधिकरण को सौंप दी, वही किसान अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही बल्कि किसानों के साथ हो रहे अन्याय की भी कहानी बयां करता है।
