संचार नाउ, राजस्थान। वीरता, त्याग और जनसंघर्षों की पावन धरती राजस्थान 28 मई को उस महान क्रांतिकारी को श्रद्धापूर्वक स्मरण करेगी, जिसने भारतीय किसान आंदोलन को नई दिशा दी और किसानों को अन्याय के विरुद्ध संगठित संघर्ष का मार्ग दिखाया। क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक की पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाला “बिजौलिया से भारत तक : किसान स्वाभिमान सम्मेलन” केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसान स्वाभिमान, अधिकार और इतिहास को नमन करने का राष्ट्रीय अभियान है।
जब बिजौलिया की धरती से उठी स्वाभिमान की मशाल
मेवाड़ रियासत के बिजौलिया क्षेत्र में किसानों पर भारी करों, बेगार और शोषण का बोझ था। खेत किसान जोतता था, लेकिन उसकी मेहनत का फल अत्याचार की व्यवस्था निगल जाती थी। इसी अन्याय के विरुद्ध जब किसानों ने एकजुट होकर आवाज उठाई, तब इस आंदोलन को विचार, संगठन और नेतृत्व देने के लिए आगे आए विजय सिंह पथिक।
उन्होंने किसानों को यह विश्वास दिलाया कि वे केवल करदाता नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सम्मान के वास्तविक अधिकारी हैं। पथिक ने किसान चेतना को नई ऊर्जा दी और साबित किया कि जब अन्नदाता संगठित होता है, तो इतिहास बदल जाता है।
राजस्थान से उठी आवाज, पूरे भारत में बनी प्रेरणा
बिजौलिया किसान आंदोलन भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी। इस संघर्ष ने किसान आंदोलनों को नई दिशा दी और स्वतंत्रता आंदोलन में जनभागीदारी को मजबूत किया। यह आंदोलन आज भी बताता है कि किसान केवल खेतों का रक्षक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव है।
सम्मेलन का उद्देश्य: इतिहास से प्रेरणा, भविष्य के लिए संकल्प
“बिजौलिया से भारत तक : किसान स्वाभिमान सम्मेलन” का उद्देश्य उस संघर्ष चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जिसने अन्याय के सामने झुकने से इंकार किया। सम्मेलन के माध्यम से किसान आंदोलनों के इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और किसान एकता के महत्व पर सार्थक संवाद होगा।
विजय सिंह पथिक: त्याग, संघर्ष और जनसेवा का प्रतीक
विजय सिंह पथिक ने अपना जीवन किसानों, मजदूरों और शोषित समाज की आवाज बनने में समर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व साहस, संगठन और सामाजिक परिवर्तन का प्रेरक उदाहरण है। उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित यह सम्मेलन उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और किसान स्वाभिमान को नई ऊर्जा देने का संकल्प है।
किसान स्वाभिमान की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प
बिजौलिया आंदोलन ने यह संदेश दिया कि संगठित समाज किसी भी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दे सकता है। आज आवश्यकता है कि इस गौरवशाली विरासत को केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे जनचेतना का हिस्सा बनाया जाए।
“बिजौलिया से भारत तक : किसान स्वाभिमान सम्मेलन” उसी अमर चेतना का विस्तार है—जहाँ किसान केवल संघर्ष का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और राष्ट्रनिर्माण की सबसे बड़ी शक्ति है।
